बांग्लादेश में अमेरिका का नया दांव- जमात-ए-इस्लामी से बढ़ाई नजदीकियां
वॉशिंगटन। बांग्लादेश के बदलते राजनीतिक परिदृश्य के बीच अमेरिका की एक कथित नई रणनीति ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। कट्टरपंथ के खिलाफ वैश्विक स्तर पर सख्त रुख अपनाने वाला अमेरिका अब बांग्लादेश की प्रमुख इस्लामी पार्टी, जमात-ए-इस्लामी को साधने की कोशिश करता नजर आ रहा है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ढाका में तैनात एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक की कुछ महिला पत्रकारों के साथ बंद कमरे में हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने आई है, जिसमें जमात-ए-इस्लामी के प्रति अमेरिका के बदलते रुख के संकेत मिलते हैं। इस बातचीत में राजनयिक ने स्वीकार किया कि बांग्लादेश धीरे-धीरे इस्लामिक शिफ्ट की ओर बढ़ रहा है और आगामी 12 फरवरी को होने वाले चुनावों में जमात-ए-इस्लामी अपने अब तक के सबसे शानदार प्रदर्शन की ओर अग्रसर हो सकती है। अमेरिकी राजनयिक ने यहाँ तक कहा कि अमेरिका चाहता है कि जमात उसके दोस्त बने और उन्होंने पत्रकारों को सुझाव दिया कि पार्टी की प्रभावशाली छात्र इकाई, इस्लामी छात्र शिबिर को मीडिया में उचित स्थान दिया जाना चाहिए।
जमात-ए-इस्लामी का इतिहास बांग्लादेश में काफी विवादास्पद रहा है। यह वही संगठन है जिसने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का पुरजोर विरोध किया था और लंबे समय तक इस पर प्रतिबंध लगा रहा। पार्टी शरिया आधारित शासन की कट्टर समर्थक रही है और उस पर अक्सर पाकिस्तान समर्थक रुख अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में जमात ने अपनी छवि बदलने की कोशिश की है और खुद को भ्रष्टाचार विरोधी व सुधार केंद्रित दल के रूप में पेश कर रही है ताकि मुख्यधारा के मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ा सके। अमेरिकी राजनयिक ने बैठक में यह भी स्पष्ट किया कि यदि जमात सत्ता में आने के बाद महिलाओं पर पाबंदियां लगाने या शरिया कानून थोपने जैसे चरम कदम उठाती है, तो अमेरिका मूकदर्शक नहीं बना रहेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे किसी भी प्रयास की स्थिति में अमेरिका अपने आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल करेगा और बांग्लादेश पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लगा सकता है, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी।
हालांकि, इस विवाद के तूल पकड़ने के बाद ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि यह एक सामान्य और अनौपचारिक चर्चा थी और अमेरिका किसी विशेष राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करता। दूसरी ओर, जमात के प्रवक्ताओं ने भी इसे एक व्यक्तिगत अवलोकन मात्र बताकर खारिज करने की कोशिश की है। लेकिन अमेरिका की इस कथित गुप्त कूटनीति ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत लंबे समय से जमात-ए-इस्लामी को क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में देखता रहा है, विशेषकर उसके पाकिस्तान के साथ कथित संबंधों और कट्टरपंथी विचारधारा के कारण। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध पहले से ही तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में अमेरिका का जमात के साथ सहयोग बढ़ाना भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंधों में एक नई दरार पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि अटलांटिक काउंसिल जैसे संस्थानों की राय में बांग्लादेश को लेकर भारत की सबसे बड़ी चिंता हमेशा से जमात रही है। यदि वाशिंगटन अपनी नीति में बदलाव करते हुए जमात-ए-इस्लामी को राजनीतिक मुख्यधारा में वैधता दिलाने में मदद करता है, तो इसका असर केवल बांग्लादेश की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। यह दक्षिण एशिया के पूरे भू-राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करेगा और भारत के लिए अपनी सीमाओं पर सुरक्षा चुनौतियों को और अधिक जटिल बना सकता है। कुल मिलाकर, अमेरिका की यह नई पहल एक ऐसे मोड़ पर आई है जहाँ बांग्लादेश अपनी लोकतांत्रिक पहचान और बढ़ते धार्मिक प्रभाव के बीच संघर्ष कर रहा है।


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