कर्नाटक की सिद्दारमैया ने दलित-OBC मठ को दी 255 करोड़ की जमीन
नई दिल्ली। कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार (Siddaramaiah government) ने एक बड़ा फैसला लिया है. उसने बेंगलुरू (Bengaluru) में दलित और पिछड़े वर्गों के 22 मठों को लगभग 255 करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी जमीन आवंटित करने की मंजूरी दे दी है. यह फैसला वित्त और कानून विभाग की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए लिया गया है. इन विभागों ने चेतावनी दी थी कि इससे कानूनी चुनौतियां आ सकती हैं, क्योंकि यह गोमाला भूमि और शहर सीमा के भीतर की संरक्षित जमीन है. बेंगलुरु उत्तर के रावुट्टनहल्ली और दासनापुरा इलाकों में कुल लगभग 52 एकड़ जमीन का आवंटन किया गया है. प्रत्येक मठ को उसके आकार, अनुयायियों और सामाजिक कार्य के आधार पर 20 गुंटा से चार एकड़ तक जमीन मिलेगी. वित्त विभाग ने जमीन की बाजार कीमत को प्रति एकड़ एक करोड़ रुपये बताया, जबकि रूपांतरण के बाद यह 1.8 करोड़ और विकसित होने पर 4.8 करोड़ तक पहुंच सकती है. कुल मूल्यांकन करीब 255 करोड़ रुपये का है.
गोमाला भूमि पशुचारण और पर्यावरण संरक्षण के लिए आरक्षित होती है. सुप्रीम कोर्ट ने जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य (2011), हिंच लाल तिवारी बनाम कमल देवी (2001) और संबंधित मामलों में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि ऐसी भूमि जल निकायों को सार्वजनिक उपयोग के लिए संरक्षित रखा जाए. इन फैसलों में राज्यों को निजी या सरकारी परियोजनाओं के लिए इनका उपयोग न करने की हिदायत दी गई है. कानून और संसदीय मामलों के अधिकारियों ने भी कर्नाटक भूमि अनुदान नियम, 1969 का हवाला देते हुए कहा कि शहर सीमा के भीतर निजी संस्थाओं को सरकारी जमीन नहीं दी जा सकती और इसे सार्वजनिक उद्देश्य के लिए आरक्षित रखना चाहिए. प्रस्तावित जमीन पूर्व बीबीएमपी मुख्यालय से 18 किमी के दायरे में आती है, इसलिए नियमों के अनुसार अनुदान संभव नहीं है.
पिछले सप्ताह आवंटन को मंजूरी
फिर भी, कांग्रेस सरकार ने पिछले सप्ताह इस आवंटन को मंजूरी दे दी. राजस्व मंत्री कृष्णा बायरेगौड़ा ने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि विभागों की नकारात्मक राय सामान्य होती है. उन्होंने सामाजिक न्याय और समानता के आधार पर इसे उचित ठहराया. मंत्री ने पूछा कि जब प्रमुख समुदायों के मठों को एकड़ों में जमीन दी गई, तो नियम और विनियम केवल कमजोर और वंचित समुदायों के मठों पर ही क्यों लागू हों?
उन्होंने इसे ऐतिहासिक असमानता को सुधारने का कदम बताया. यह फैसला 2025 की शुरुआत में दलित और पिछड़े वर्गों के मठाधीशों की अपील के बाद आया है. पिछड़े और दलित मठाधीशारा ओक्कुटा ने बेंगलुरु में 22 मठों के लिए जमीन और सहायता मांगी थी, ताकि वे परोपकारी संस्थाएं चला सकें. हालांकि, राजस्व अधिकारियों ने कुछ मठों की हालिया स्थापना और परोपकारी कार्यों के प्रमाण की कमी पर सवाल उठाए थे.


ईरान का बड़ा हमला, एमेजॉन मुख्यालय पर दागी मिसाइल—बहरीन ने की पुष्टि
देवेन्द्र यादव ने एलजी संधू से की अहम मुलाकात