मामले को लंबे समय तक लंबित रखने पर ट्रायल जज के खिलाफ जांच के आदेश — मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का सख्त रुख
जबलपुर|मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए ट्रायल कोर्ट के एक जज के आचरण की जांच (Enquiry) कराने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने पाया कि संबंधित जज ने न केवल हाई कोर्ट के निर्देशों का सही तरीके से पालन नहीं किया, बल्कि मामले को लंबे समय तक अनावश्यक रूप से लंबित भी रखा।
यह आदेश न्यायमूर्ति जी. एस. अहलूवालिया (Justice G. S. Ahluwalia) की एकल पीठ द्वारा अशोक कुमार व अन्य v . श्रीमती मीरा दे (MCC No. 39/2022) मामले में पारित किया गया।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह विवाद एक संपत्ति से जुड़ा है, जिसमें पहले हाई कोर्ट ने संबंधित भूमि पर यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का अंतरिम आदेश दिया था। इसके बावजूद आरोप लगाया गया कि प्रतिवादी पक्ष ने उस भूमि पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया, जो अदालत के आदेश की अवहेलना माना गया।
इसके बाद आवेदकों ने Order 39 Rule 2A, CPC के तहत याचिका दायर कर अदालत के आदेश की अवमानना की शिकायत की।
हाई कोर्ट का पहले निर्देश:
हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया था कि:
1. गवाहों के बयान दर्ज किए जाएं
2. यह जांच की जाए कि क्या वास्तव में स्टेटस-क्वो आदेश का उल्लंघन हुआ है
3. और पूरी जांच कर रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंपी जाए
लेकिन लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर सवाल:
जब मामला दोबारा हाई कोर्ट पहुंचा तो यह सामने आया कि ट्रायल कोर्ट ने गवाहों के बयान दर्ज करने के बजाय केवल PWD के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर की स्पॉट इंस्पेक्शन रिपोर्ट मंगवाई और उसी के आधार पर रिपोर्ट भेज दी।
अदालत ने पाया कि लगभग डेढ़ साल से अधिक समय बीतने के बावजूद जांच पूरी नहीं की गई, जो न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही मानी गई।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी:
न्यायमूर्ति जी. एस. अहलूवालिया ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को पहले गवाहों के बयान दर्ज करने चाहिए थे और उसके बाद तथ्यों के आधार पर यह तय करना चाहिए था कि अदालत के आदेश का उल्लंघन हुआ है या नहीं।
हाई कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्देश:
संबंधित ट्रायल जज के आचरण की जांच कराने की सिफारिश
पूरी रिपोर्ट और रिकॉर्ड हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का आदेश
मामला अब किसी अन्य सिविल जज को ट्रांसफर किया जाएगा
नई अदालत को 4 महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश
यह फैसला न्यायिक अनुशासन और अदालत के आदेशों की गंभीरता को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


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