सिटी टुडे

नई दिल्ली।   नई दिल्ली की सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक खामोश लेकिन बेहद रणनीतिक हलचल तेज है। देश की सबसे ताकतवर जांच एजेंसी, सीबीआई के निदेशक प्रवीण सूद का कार्यकाल अपनी ढलान पर है और रायसीना हिल्स के बंद कमरों में उस उत्तराधिकारी की तलाश शुरू हो चुकी है, जो आने वाले वर्षों में एजेंसी का 'चेहरा' और 'चरित्र' तय करेगा।  इस बार यह प्रक्रिया महज फाइलों का लेन-देन नहीं है, बल्कि एक वास्तविक शतरंज की बिसात बन चुकी है, जहाँ हर चाल के पीछे दूरगामी संस्थागत संकेत छिपे हैं। ​इस रेस के केंद्र में तीन ऐसे नाम हैं, जिनमें से हर एक भारतीय प्रशासनिक ढांचे की एक अलग शक्ति और शैली का प्रतिनिधित्व करता है। सबसे वरिष्ठ नाम के रूप में हरियाणा कैडर (1990 बैच) के शत्रुजीत कपूर उभरते हैं, जो वर्तमान में इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) के महानिदेशक के रूप में एक महत्वपूर्ण केंद्रीय कमान संभाल रहे हैं। वरिष्ठता के शिखर पर बैठे कपूर के पास राज्य पुलिस की कमान संभालने का भी ठोस अनुभव है, जो उन्हें तंत्र के लिए एक 'भरोसेमंद ढाल' बनाता है। हालांकि, उनके साथ अतीत में जुड़े कुछ विवाद इस ऊंचे पद के लिए 'परसेप्शन' की एक कठिन परीक्षा बन सकते हैं। ​वहीं दूसरी ओर, केरल कैडर (1993 बैच) के योगेश गुप्त उस नई पीढ़ी के अन्वेषक बनकर उभरते हैं, जिसकी जरूरत आज के जटिल आर्थिक अपराधों के युग में सबसे ज्यादा है। 

वर्तमान में केरल में फायर एंड रेस्क्यू सर्विसेज के महानिदेशक के पद पर तैनात योगेश गुप्त को हाल ही में केंद्र में महानिदेशक रैंक के लिए पैनल में शामिल किया गया है। कॉर्पोरेट फ्रॉड को भेदने में उनकी महारत और ईडी में स्पेशल डायरेक्टर के रूप में उनका अनुभव उन्हें एक ऐसा रणनीतिकार सिद्ध करता है जो केवल जांच नहीं करता, बल्कि अपराध की तकनीकी जड़ों पर प्रहार करने की क्षमता रखता है। ​इन दो छोरों के बीच आंध्र प्रदेश कैडर (1993 बैच) के अमित गर्ग एक ऐसी 'शांत शक्ति' के रूप में खड़े हैं, जो इस दौड़ में सबसे ज्यादा संतुलन लेकर आते हैं। वर्तमान में हैदराबाद स्थित सरदार पटेल पुलिस नेशनल अकादमी के निदेशक के रूप में वे देश के भविष्य के पुलिस अफसरों को तराश रहे हैं। उनकी लो-प्रोफाइल कार्यशैली और विवादों से कोसों दूर रहने वाली छवि उन्हें चयन समिति के लिए 'न्यूनतम विरोध' वाला सबसे सुरक्षित विकल्प बना सकती है। 

अक्सर जब सत्ता और न्यायपालिका के बीच किसी नाम पर सहमति की सुई अटकती है, तब अमित गर्ग जैसे बेदाग नाम ही निर्णायक मोहरा साबित होते हैं।​सुप्रीम कोर्ट के सख्त पहरे और विजिलेंस के कड़े मानकों ने अब इस चयन को एक ऐसी 'अग्निपरीक्षा' बना दिया है, जहाँ सरकार के पास मनमर्जी की गुंजाइश बेहद कम बची है। यह मुकाबला अब महज तीन अधिकारियों के बीच नहीं, बल्कि हरियाणा की प्रशासनिक सख्ती, केरल की तकनीकी विशेषज्ञता और हैदराबाद की प्रशिक्षण शुचिता के बीच एक सही संतुलन की तलाश है।  अंततः, यह नियुक्ति केवल एक कुर्सी भरने का फैसला नहीं, बल्कि यह संकेत देगी कि आने वाले समय में CBI दबावों के बीच संतुलन साधेगी, जटिल आर्थिक अपराधों से निपटेगी या फिर संस्थागत स्थिरता को प्राथमिकता देगी। यही वह व्यापक संदेश है, जिसकी प्रतीक्षा आज पूरा सिस्टम कर रहा है। पहले राजस्थान के डीजीपी राजीव शर्मा के नाम की भी जबरदस्त चर्चा थी । उनका नाम अब चर्चा से बाहर इसलिए होगया, क्योंकि कायदे से ये 15 मार्च को ही रिटायर हो चुके है । वर्तमान अवधि डीजीपी बनने की वजह से बोनस के रूप में प्राप्त है । नियमों की अनदेखी की जाती है तो ये काबिज हो सकते है इस पद पर । लेकिन ऐसी संभावना अब न के बराबर है ।