मध्य प्रदेश के झाबुआ में जल जीवन मिशन 430 करोड़ खर्च, 519 गांवों में योजना पहुंची, लेकिन पानी नहीं
रवीश पाल सिंह
झाबुआ। "जल ही जीवन है" का दावा मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के कई गांवों में अधूरा नजर आता है. सरकारी रिकॉर्ड में करोड़ों रुपये खर्च और योजनाएं पूरी होने की बात है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग कहानी बयां करती। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, जिले में अब तक इस योजना पर 430 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं. 713 गांवों में से 519 गांवों की योजनाएं पूरी कर पंचायतों को हैंडओवर भी की जा चुकी हैं. कागजों पर तस्वीर संतोषजनक दिखाई देती है, लेकिन कई गांवों में लोग आज भी पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. झाबुआ जिले के खेड़ा मे जहां पानी का संकट साफ-साफ दिखाई देता है, 10 से 12 महिलाएं सिर पर बर्तन रखकर गांव से करीब एक किलोमीटर दूर पानी लेकर लौटती दिखीं. इस रास्ते में पत्थर, चट्टानें और ऊबड़-खाबड़ पगडंडियां हैं. तेज गर्मी और 42 डिग्री सेल्सियस के आसपास तापमान के बीच महिलाएं सूखी पड़ी भामची नदी के बीच खोदे गए गड्ढों से पानी निकालती हैं. ग्रामीण महिलाओं के अनुसार, यह उनका रोज का काम है. पानी भरने और उसे गांव तक पहुंचाने में दो से तीन घंटे लग जाते हैं. किसी के सिर पर एक मटका होता है तो कोई दो-दो बर्तन लेकर लौटती है. विशेष अवसरों या घर में मेहमान आने पर दिन में दो बार भी यह सफर तय करना पड़ता है. एक बुजुर्ग महिला बताती हैं कि वर्षों से पानी ढोते-ढोते अब पैरों ने जवाब देना शुरू कर दिया है. ग्रामीणों का कहना है कि गांव में जल जीवन मिशन के तहत वर्ष 2022 में पाइपलाइन बिछाई गई थी, लेकिन चार साल बाद भी न तो नल लगाए गए और न ही घरों तक पानी पहुंचा।
जहां नल हैं, वहां पानी नहीं
पारा पंचायत के बखतपुरा वार्ड में स्थिति और भी चिंताजनक दिखाई दी. यहां पाइपलाइन बिछ चुकी है और घरों के बाहर नल भी लगे हुए हैं. सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, काम पूरा कर पंचायत को सौंपा जा चुका है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें आज भी पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है.कई परिवार हर महीने पानी खरीदने पर खर्च कर रहे हैं. घरों के बाहर बड़े-बड़े ड्रम रखे थे, जिनमें टैंकर से लाया गया पानी जमा किया जाता है. वार्ड में लगे नलों की स्थिति भी सवाल खड़े करती है. अधिकांश नलों से पानी नहीं आता और कई स्थानों पर ग्रामीणों ने उन्हीं नलों से अपनी बकरियां बांध रखी थीं. स्थानीय निवासी सतीश के अनुसार, पानी की समस्या को लेकर अलग-अलग प्रशासनिक अधिकारियों को सात बार पत्र भेजे गए, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. उनका आरोप है कि पानी की आपूर्ति नहीं होने के बावजूद पंचायत जल कर जमा करने का दबाव बनाती है।
50 हजार लीटर की टंकी, लेकिन लगभग खाली
धांधलपुरा में गांव के बीचों-बीच 50 हजार लीटर क्षमता की एक बड़ी पानी की टंकी बनाई गई है. ग्रामीणों का कहना है कि टंकी बनने के बाद शुरुआती दिनों में कुछ समय तक पानी मिला, लेकिन बाद में आपूर्ति लगभग बंद हो गई. टंकी के भीतर मौजूद पानी की मात्रा इसकी क्षमता की तुलना में बेहद कम दिखाई दी. वहीं, परिसर में स्थापित वाटर डिसइन्फेक्शन सिस्टम भी निष्क्रिय हालत में मिला. मशीन पर धूल जमी हुई थी और उसके तार खुले हुए थे. स्थानीय लोगों के मुताबिक, मशीन को चालू करने के लिए आवश्यक बिजली कनेक्शन ही उपलब्ध नहीं कराया गया. परिणामस्वरूप लाखों रुपये खर्च कर लगाया गया सिस्टम कभी संचालित ही नहीं हो सका।
430 करोड़ खर्च, फिर भी संकट
झाबुआ जिले के 713 गांवों में से 519 में जल जीवन मिशन के कार्य पूरे कर पंचायतों को हैंडओवर किए जा चुके हैं. जिले में अब तक इस योजना पर लगभग 430 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, खेड़ा गांव में करीब 75 लाख रुपये के कार्य हुए हैं. पारा पंचायत में लगभग 50 लाख रुपये खर्च किए गए, जबकि धांधलपुरा में एक करोड़ रुपये से अधिक की लागत से टंकी और पाइपलाइन का निर्माण किया गया. इसके बावजूद इन गांवों में रहने वाले लोगों का सवाल एक ही है- यदि योजनाएं पूरी हो चुकी हैं, तो पानी कहां है?
जब दावों से नहीं मिलते जमीनी हालात
इस संबंध में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर जितेंद्र मावी का कहना है कि विभाग योजना पूरी कर पंचायतों को सौंप देता है. इसके बाद संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी स्थानीय स्तर पर होती है. वहीं, प्रदेश की पीएचई मंत्री संपतिया उइके का कहना है कि कई स्थानों पर भीषण गर्मी और भूजल स्तर में गिरावट के कारण जल आपूर्ति प्रभावित हुई है. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर विभाग इन समस्याओं के समाधान के लिए काम कर रहा है. हालांकि जमीनी तस्वीर कई सवाल छोड़ जाती है. जब महिलाएं भीषण गर्मी में सूखी नदी के गड्ढों से पानी भरने को मजबूर हों, जब ग्रामीण टैंकर खरीदकर गुजारा कर रहे हों, जब करोड़ों रुपये की टंकियां लगभग खाली खड़ी हों और जब नल जल आपूर्ति के बजाय पशुओं को बांधने का साधन बन गए हों, तब योजनाओं की प्रभावशीलता और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।


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