दतिया में एक बार फिर दिग्विजय सिंह की राजनीति चर्चा में... लेकिन क्या इस बार कांग्रेस अपने ही कार्यकर्ता से हार गई? मामला अवधेश नायक का।
दतिया उपचुनाव में कांग्रेस का उम्मीदवार तय हो चुका है। मंच सज चुका है, भाषण हो चुके हैं, लेकिन चुनावी शोर के बीच एक सवाल पूरे घटनाक्रम पर भारी पड़ रहा है।
आखिर अवधेश नायक इतने आहत क्यों हैं?
इस सवाल का जवाब खुद अवधेश नायक के बयानों और दिग्विजय सिंह के सार्वजनिक वक्तव्य में छिपा दिखाई देता है।
अवधेश नायक का कहना है कि 2023 में पहले उन्हें कांग्रेस का प्रत्याशी बनाया गया, फिर टिकट बदलकर राजेंद्र भारती को दे दिया गया। उस समय उनसे कहा गया—"पार्टी को जिताइए, अगली बार टिकट आपका होगा।"
उन्होंने दावा किया कि उन्होंने पार्टी के लिए पूरी निष्ठा से काम किया और चुनाव जिताने में अपनी भूमिका निभाई।
फिर इस उपचुनाव से करीब 20–25 दिन पहले उनकी मुलाकात दिग्विजय सिंह से हुई। अवधेश नायक के अनुसार, उन्हें बताया गया कि "आपका फीडबैक अच्छा है, लेकिन आप पहले आरएसएस से जुड़े रहे हैं, वीडी शर्मा के करीबी हैं। कहीं ऐसा न हो कि हम आपको टिकट दें और आप जीतकर भाजपा में चले जाएं।"
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है।
अगर किसी नेता पर इतना बड़ा अविश्वास था, तो तीन साल तक उससे पार्टी का काम क्यों लिया गया?
अगर भरोसा नहीं था, तो अगली बार टिकट का आश्वासन क्यों दिया गया?
और अगर भरोसा था, तो फिर अंतिम समय में यही आशंका क्यों सामने आई?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दिग्विजय सिंह ने दतिया की सभा के मंच से सार्वजनिक रूप से कहा—
"मैंने आपके टिकट का विरोध किया था... यदि कहीं मेरा व्यवहार आपके लिए अपमानजनक रहा हो तो मैं आपसे माफी चाहता हूं।"
यहीं यह पूरा घटनाक्रम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।
राजनीति में टिकट देना या न देना पार्टी का अधिकार है। हर दल अपने हिसाब से उम्मीदवार चुनता है। लेकिन क्या किसी समर्पित कार्यकर्ता की निष्ठा पर संदेह जताना उचित है, खासकर तब जब उसी कार्यकर्ता से पहले पार्टी के लिए संघर्ष और समर्पण की अपेक्षा की गई हो?
अवधेश नायक ने भी साफ कहा कि उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह से कोई नाराजगी नहीं है। उनकी नाराजगी प्रदेश नेतृत्व से है।
यानी विवाद व्यक्ति का नहीं, निर्णय लेने की प्रक्रिया का है।
अब एक और सवाल भी राजनीतिक गलियारों में उठ रहा है।
क्या घनश्याम सिंह को दिग्विजय सिंह का करीबी होने का फायदा मिला?
इसका कोई सार्वजनिक प्रमाण नहीं है, इसलिए इसे तथ्य नहीं कहा जा सकता। लेकिन जब टिकट वितरण के बाद ऐसे सवाल उठने लगें, तो यह संगठन के भीतर असंतोष की ओर जरूर इशारा करता है।
अब नाटकीय घटना के तहत दिग्विजय सिंह ने मंच से माफी मांगकर राजनीतिक विनम्रता दिखाई। लेकिन माफी के बाद भी मूल सवाल वहीं खड़ा है—
अगर विश्वास ही नहीं था, तो आश्वासन क्यों दिया गया?
अगर टिकट नहीं देना था, तो स्पष्ट मना कर देते। लेकिन पहले उम्मीद जगाना और फिर निष्ठा पर संदेह जताना—क्या यह किसी कार्यकर्ता के सम्मान के साथ न्याय है?
राजनीति में कार्यकर्ता सिर्फ पोस्टर नहीं लगाता, वह अपना समय, प्रतिष्ठा और भविष्य भी दांव पर लगाता है। इसलिए टिकट न मिलने का दर्द अलग बात है, लेकिन सम्मान पर सवाल उठने का दर्द कहीं अधिक गहरा होता है।
शायद यही कारण है कि आज दतिया में चर्चा टिकट से ज्यादा विश्वास की हो रही है।
क्योंकि टिकट हारने से बड़ा नुकसान तब होता है, जब संगठन अपने ही समर्पित कार्यकर्ता का भरोसा हारने लगे।
सिटी टुडे को प्राप्त जानकारी अनुसार अवधेश नायक अब जल्दी ही घर वापसी की घोषणा करेंगे परंतु इसके पूर्व उन्होंने अपने निवास पर भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी का सम्मान किया राजनीतिक समीक्षकों के अनुसार अवधेश नायक की घर वापसी कब हो परंतु वह भाजपा प्रत्याशी को जीताने के लिए दूढ संकल्प ले चुके हैं।


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