प्रधानता आत्मा को
मनुष्य सामान्यत: जो बाह्य में देखता, सुनता, समझता है वह यथार्थ ज्ञान नहीं होता। किन्तु भ्रमवश उसी को यथार्थ ज्ञान मान लेता है।
अवास्तविक ज्ञान को ही ज्ञान समझकर और उसके अनुसार अपने कार्य करने केकारण मनुष्य अपने मूल उद्देश्य सुख-शान्ति की दिशा में अग्रसर न होकर विपरीत दिशा में चल पड़ता है। यथार्थ ज्ञान की अनुभावक मनुष्य की अंतरात्मा ही है। शुद्ध, बुद्ध एवं स्वयं चेतन होने से उसको अज्ञान का अंधकार कभी नहीं व्यापसकता। परमात्मा का अंश होने से वह उसी तरह सत्, चित् एवं आनंद है, जिस प्रकार परमात्मा के समीप असत्य की उपस्थिति संभव नहीं है उसी प्रकार उसके अंश आत्मा में भी असत्य का प्रवेश सम्भव नहीं।
मनुष्य की अंतरात्मा जो कुछ देखती, सुनती और समझती है, वही सत्य और यथार्थ ज्ञान है। अंतरात्मा से अनुशासित मनुष्य ही सत्य के दर्शन तथा यथार्थ ज्ञान की उपलब्धि कर सकता है। यथार्थ ज्ञान की उपलब्धि हो जाने पर मनुष्य के सारे शोक-संतापों का स्वत: समाधान हो जाता है। अंतरात्मा की बात सुनना और मानना ही उसका अनुशासन है। मनुष्य की अन्तरात्मा बोलती है, किन्तु उसकी वाणी सूक्ष्मातिसूक्ष्म होती है, जिसे बाह्य एवं स्थूल श्रवणों से नहीं सुना जा सकता। मनुष्य की अन्तरात्मा बोलती है किन्तु मौन विचार स्फुरण की भाषा में, जिसे मनुष्य अपनी कोलाहलपूर्ण मानसिक स्थिति में नहीं सुन सकता। अन्तरात्मा की वाणी सुनने के लिए जरूरी है मनुष्य का मानसिक कोलाहल बन्द हो।
अन्तरात्मा का सान्निध्य मनुष्य को उसकी आवाज सुनने योग्य बना देता है। यों मनुष्य की अन्तरात्मा उसमें ओतप्रोत है, पर उसका सच्चा सान्निध्य पाने के लिए उसे जानना आवश्यक है। परिचयहीन निकटता भी एक दूरी होती है। रेलयात्रा में कन्धे से कन्धा मिलाये बैठे दो आदमी अपरिचित होने के कारण समीप होने पर भी एक-दूसरे से दूर होते हैं। अजनबी छोड़िए, जिन्दगी भर एक दूसरे केसाथ रहने पर भी आन्तरिक परिचय के अभाव में कई लोग एक-दूसरे से दूर ही रहते हैं।
अन्तरात्मा जानने का एक ही उपाय है कि उसके विषय में सदा जिज्ञासु तथा सचेत रहा जाए। जो जिसके विषय में जितना अधिक जिज्ञासु एवं सचेत रहता है, वह उसकेविषय में उतनी ही गहरी खोज करता है और निश्चय ही उसे पा लेता है। आत्मा के विषय में अधिक से अधिकजिज्ञासु एवं सचेत रहिए। अपनी आत्मा से परिचित होंगे, उसकी वाणी सुनेंगे, सच्चा मार्ग निर्देशन पाएंगे, तो अज्ञान से मुक्त हों यथार्थ सुख-शान्ति के अधिकारी बनेंगे।


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